क्या बीएमडब्ल्यू और मर्सिडीज जैसी इंपोर्टेड लग्जरी कार होंगी सस्ती ? जानिए भारत-ईयू ट्रेड डील का गाड़ियों पर क्या पड़ेगा असर
यदि आप भी कोई इंपोर्टेड कार लेेने की प्लानिंग कर रहे हैं तो अपनी चेकबुक निकालने से पहले आपको ये बातें जान लेनी चाहिए।
प्रकाशित: जनवरी 27, 2026 06:30 pm । भानु
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भारत और यूरोपीय संघ ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके तहत पूरी तरह से इंपोर्टेड व्हीकल्स पर इंपोर्ट ड्यूटी 110 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत हो जाएगी। स्वाभाविक रूप से, इससे कार लवर्स में हलचल मच गई है। ऐसे में
कब से होगी प्रभावी?
- संक्षिप्त उत्तर: तुरंत नहीं।
- विस्तृत उत्तर: इंपोर्ट ड्यूटी में कोई ठोस कमी देखने में कम से कम एक या दो साल लगेंगे। समझौते के अनुसार, ड्यूटी को शुरू में 40% और फिर अंततः 10% तक कम किया जाएगा।
- कारण: इसके लिए लीगल और रेगुलेटरी क्लीयरेंस प्राप्त करनी होंगी। साथ ही, संबंधित संसदों को भी समझौते की पुष्टि करनी होगी। यह प्रक्रिया न तो आसान है और न ही तुरंत पूरी की जा सकती है।

कौनसी कारें होंगी सस्ती?
- केवल वे कारें जो पूरी तरह से भारत के बाहर तैयार होती है और असेंबल की जाती हैं (सीबीयू), इस ऑफर के लिए पात्र होंगी।
- यह ऑफर भारत में असेंबल की जाने वाली लग्जरी ब्रांड की गाड़ियों पर लागू नहीं होगा।
- मर्सिडीज-बेंज, ऑडी और बीएमडब्ल्यू जैसे ब्रांड्स के अधिकांश लोकप्रिय सेडान और एसयूवी पहले से ही भारत में असेंबल किए जा रहे हैं और इनकी कीमतों में कमी आने की संभावना नहीं है।

- केवल मर्सिडीज-एएमजी रेंज, ऑडी आरएस और बीएमडब्ल्यू एम मॉडल जैसे स्पेशल तौर पर तैयार किए जाने वाले और हाई परफॉर्मेंस वाले मॉडलों को ही इसका महत्वपूर्ण लाभ मिलेगा। उदाहरण के लिए: बीएमडब्ल्यू एम3, मर्सिडीज-एएमजी जी 63, ऑडी आरएस 5, पोर्श 911।

- पोर्श, बेंटले और रोल्स-रॉयस जैसे अल्ट्रा-बेस्पोक और स्पोर्ट्सकार मेकर्स अपने प्रोडक्ट्स की बेहतर कीमत तय कर सकेंगे।

- स्कोडा और फोक्सवैगन जैसे अन्य यूरोपीय मैन्यूफैक्चरर्स, जिनके पास गोल्फ जीटीआई और ऑक्टाविया आरएस जैसे लिमिटेड इंपोर्टेड मॉडल हैं, वे अपनी कारों की कीमत अधिक आक्रामक तरीके से तय कर सकेंगे।
कितनी हो जाएगी बचत?
- मान लीजिए कि टैरिफ मौजूदा 110% से घटकर 40% हो जाता है, तो पूरी तरह से इंपोर्टेड मॉडलों की कीमतों में कुल 33% की गिरावट आ सकती है। उदाहरण के लिए, एक लग्जरी कार जिसकी कीमत वर्तमान में 1 करोड़ रुपये (एक्स-शोरूम) है, उसकी कीमत लगभग 66 लाख रुपये हो सकती है।
- यदि टैरिफ घटकर 10% हो जाता है, तो कीमत लगभग 51 लाख रुपये तक गिर सकती है।
- हम इसे काल्पनिक इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इसमें कई फैक्टर्स शामिल हैं। कारमेकर्स लाभ का मार्जिन बढ़ाने का विकल्प चुन सकते हैं, मुद्रा का अवमूल्यन हो सकता है, या कोई काउंटर-सेस लगाया जा सकता है जो पूरे लाभ को अवशोषित या नकार सकता है।
- कृपया ध्यान दें कि कारमेकर्स को कुछ व्हीकल्स के लिए निश्चित प्राइस पॉइन्ट्स बनाए रखनी पड़ती है। यह उम्मीद न करें कि कोई बड़ी लग्जरी सेडान अचानक एंट्री-लेवल मॉडल की कीमत पर उपलब्ध हो जाएगी।
आपके लिए इसमें क्या?
- आपको बेहतर कारें, बेहतर टेक्नोलॉजी और किफायती दामों का अनुभव मिलेगा।
- हालांकि बड़ी यूरोपीय कंपनियां अपनी अल्ट्रा-लक्जरी और हाई-परफॉर्मेंस वाली कारों के पोर्टफोलियो के साथ इसका भरपूर फायदा उठाएंगी, लेकिन हमें उम्मीद है कि फोक्सवैगन, स्कोडा और रेनो जैसी आम यूरोपीय कार कंपनियों को भी लाभ होगा।
- जो मॉडल पूरी तरह से इंपोर्टेड होने पर 'बहुत महंगे' माने जाते थे, वे अब अचानक एक किफायती विकल्प बन जाएंगे।

- एक और अनूठा मामला वह है जहां घरेलू कारखाने में सीकेडी सुविधा न होने के कारण मॉडलों को पूरी तरह से इंपोर्ट करना पड़ा। उदाहरण के लिए: स्कोडा सुपर्ब को पूरी तरह से इंपोर्ट करने पर विचार कर रही थी, क्योंकि इसका निर्माण करने वाला कारखाना केवल पूरी तरह से असेंबल की गई कार का उत्पादन कर सकता है, न कि ऐसे 'किट' का जिन्हें बाद में भारत में असेंबल किया जा सके। कम टैरिफ के साथ, स्कोडा इसकी कीमत अधिक किफायती रख सकती है।
नोट:
सीबीयू - पूरी तरह से इंपोर्टेड यूनिट। एक ऐसा व्हीकल जो विदेश में किसी कारखाने में शुरू से अंत तक बनाया जाता है और पूरी तरह से बने हुए प्रोडक्ट के रूप में एक्सपोर्ट किया जाता है। सीकेडी - पूरी तरह से अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ। अधिकांश पुर्जे और असेंबली विदेश में किसी कारखाने में तैयार होते हैं, भारत भेजे जाते हैं और फिर यहां असेंबल किए जाते हैं।
- एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्ट्स और कंपोनेंट्स पर ड्यूटी कम की गई है। समझौते में 5-10 वर्षों के भीतर ड्यूटी समाप्त करने का इरादा व्यक्त किया गया है। इसका अर्थ है कि इंपोर्टेड पार्ट्स, कंपोनेंट्स और स्पेयर पार्ट्स भी अंततः सस्ते हो जाएंगे।
- इससे भारतीय कारमेकर्स को यूरोपीय सप्लायर नेटवर्क का लाभ उठाने और भारत में बने अपने वाहनों के लिए बेहतर क्वालिटी वाले कंपोनेंट्स प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
कल से मर्सिडीज-बेंज 25 लाख रुपये में या लैंड रोवर 50 लाख रुपये में मिलने की उम्मीद मत कीजिए। ऐसा होने वाला नहीं है।
उम्मीद है कि ब्रांड्स अपने प्रोडक्ट्स में कुछ और क्रिएटिव और अग्रेसिव रुख अपनाएंगे। उदाहरण के लिए, फोक्सवैगन ग्रूप डीजल इंजन वाली कारों को फिर से पेश करने पर विचार कर सकता है, बीएमडब्ल्यू अलग-अलग बॉडी स्टाइल या इंजन विकल्पों के साथ प्रयोग कर सकती है। गोल्फ जीटीआई या ऑक्टाविया आरएस जैसी पॉपुलर इंपोर्टेड कारें भी अधिक किफायती हो सकती हैं।

इससे पॉपुलर इंपोर्टेड कारों की लोकल असेंबली की संभावना भी खुलती है, बशर्ते बाजार में उन्हें स्वीकार्यता मिले। कुल मिलाकर, यह कारमेकर्स को भारी लागत के बिना नए प्रोडक्ट्स के साथ बाजार का परीक्षण करने की अनुमति देता है। वर्तमान में, समझौते में प्रति वर्ष 250,000 वाहनों का कोटा और टैरिफ में क्रमिक कमी का प्रावधान है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि घरेलू कंपनियों को भी अपने प्रोडक्ट्स को बेहतर बनाने का अवसर और समय मिले और वे इंपोर्टेड व्हीकल्स की अचानक बाढ़ से प्रभावित न हों।
फिलहाल, हम इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि यह समझौता वास्तविकता में कैसे बदलता है।

