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    पेट्रोल में इथेनॉल के बाद अब सीएनजी की बारी, अब बायो सीएनजी लाने की तैयारी

    बायो-सीएनजी और भी सस्ती और पर्यावरण के लिए बेहतर हो सकती है, लेकिन इसकी कीमत आम आदमी को नहीं चुकानी पड़नी चाहिए।

    तीर्थ
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    Published On अगस्त 08, 2026 12:16 ist
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    published onAug 08, 2026 12:16 IST
    last updated onAug 08, 2026 12:16 IST
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    Bio-CNG Fuel And GOBARdhan Scheme explained.

    पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के विवाद के बाद सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। अब सीएनजी में भी बायो-गैस मिलाना अनिवार्य करने की योजना का ऐलान हो चुका है। गोबरधन स्कीम के तहत इसका मकसद साफ है, एनर्जी इम्पोर्ट पर निर्भरता घटाना और प्रदूषण कम करना। पर असली सवाल यह है कि मौजूदा सीएनजी कार मालिकों और नए खरीदारों की जेब पर इसका कितना असर पड़ेगा? इस पूरी योजना को हम यहाँ विस्तार से समझते हैं।

    पृष्ठभूमि: ई2ओ पेट्रोल के बाद अब सीएनजी की बारी

    भारत सरकार ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल (ई2ओ) मिलाने की नीति कुछ समय पहले लागू की थी। मकसद था कच्चे तेल का आयात कम करना और किसानों को कमाई का एक और रास्ता देना। लेकिन कई पुराने वाहन मालिकों को दिक्कतें हुईं, जैसे इंजन के पुर्जों और फ्यूल लाइन्स पर असर और माइलेज में गिरावट। अब सरकार ने सीएनजी के लिए भी एक ब्लेंडिंग प्रोग्राम तैयार किया है। फर्क यह है कि इस बार मौजूदा सीएनजी कार मालिकों के लिए राहत की गुंजाइश ज़्यादा है।

    बायो-सीएनजी क्या है और यह ई2ओ से कैसे अलग है?

    बायो-सीएनजी यानी कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) असल में जैविक कचरे से बनती है। इसके लिए खेतों की पराली, गोबर, चीनी मिलों की प्रेस मड और शहरी जैविक कचरा काम आता है। यह सब एनारोबिक डाइजेशन प्रक्रिया से गुजरता है, और इसी से मीथेन गैस तैयार होती है।

    Bio-CNG and Ethanol Blended Petrol

    इस गैस को पहले शुद्ध किया जाता है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड और नमी जैसी अशुद्धियां हट जाती हैं। शुद्धिकरण के बाद यह गैस 90% से ज्यादा मीथेन वाली बन जाती है, यानी रासायनिक तौर पर यह पारंपरिक सीएनजी जैसी ही है। यही असली बात है। एथेनॉल की रासायनिक बनावट पेट्रोल से काफी अलग होती है, लेकिन बायो-सीएनजी और नेचुरल गैस लगभग एक जैसी हैं। इसीलिए इसे मौजूदा गैस पाइपलाइनों में सीधे मिलाया जा सकता है, और कोई नया पंप भी नहीं चाहिए। ग्राहकों को पंप पर कुछ अलग नजर नहीं आएगा। बस धीरे-धीरे उनकी गाड़ी में भरने वाली गैस में रिन्यूएबल बायो-गैस का हिस्सा बढ़ता जाएगा।

    क्या हैं ब्लेंडिंग के लक्ष्य?

    सरकार ने गोबरधन (गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन) स्कीम के तहत सीजीडी कंपनियों के लिए बायो-सीएनजी मिलाना जरूरी कर दिया है। यह नियम वाहनों की सीएनजी और घरों तक पाइप से आने वाली नेचुरल गैस (पीएनजी), दोनों पर लागू होगा। इसके लिए चरणबद्ध टारगेट कुछ इस तरह तय किए गए हैं:

    वित्तीय वर्ष

    अनिवार्य ब्लेंडिंग प्रतिशत

    2026-27

    3%

    2027-28

    4%

    2028-29 से आगे

    5%

    यानी वित्त वर्ष 2028-29 तक आपकी गाड़ी में जो सीएनजी भरी जाएगी, उसका 5% हिस्सा बायो-गैस का होगा।

    सरकार यह कदम क्यों उठा रही है?

    इस नीति के पीछे सरकार के कई मकसद हैं, और बात सिर्फ पर्यावरण तक नहीं रुकती।

    • ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी एलएनजी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। देश में बायो-सीएनजी उत्पादन बढ़ा, तो यह निर्भरता कम होगी और कीमती विदेशी मुद्रा बचेगी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय गैस बाजार में कीमतें ऊपर-नीचे होती रहती हैं, उसका झटका भी भारत को कम लगेगा।

    • "वेस्ट-टू-वेल्थ" अर्थव्यवस्था: कचरे से कमाई का इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा। पराली जलाने से हर साल उत्तर भारत में जो गंभीर वायु प्रदूषण फैलता है, वही कृषि अवशेष अब फ्यूल बनाने के काम आएंगे। फायदा दोहरा है — प्रदूषण कम, ऊर्जा भी मिले।

    • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: बायो-सीएनजी प्लांट लगने से गांवों में रोजगार और उद्यमिता के नए रास्ते खुलेंगे। किसान अपने खेत का कचरा और पशुओं का गोबर बेचकर अच्छी कमाई कर सकेंगे। इससे उनकी माली हालत भी सुधरेगी।

    उत्पादन को कैसे मिलेगा बढ़ावा?

    इन लक्ष्यों को पूरा करना हो तो बड़े पैमाने पर बायो-सीएनजी उत्पादन जरूरी है। सरकार को पता है कि इसके लिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट चाहिए। इसीलिए नए सीबीजी प्लांट लगाने वालों के लिए कई तरह के इंसेंटिव रखे गए हैं:

    • गारंटीड खरीद: सीजीडी कंपनियों को बायो-सीएनजी खरीदना जरूरी होगा, इसलिए प्लांट लगाने वालों को मार्केट की फिक्र नहीं करनी पड़ेगी।

    • स्थिर मूल्य: सरकार एक पक्का प्राइसिंग फ्रेमवर्क बनाए रखेगी, जिससे सीबीजी प्लांट आर्थिक रूप से फायदेमंद रहें।

    • वित्तीय सहायता: नए प्लांट लगाने के लिए सरकार सीधे कैपिटल सपोर्ट देगी।

    • इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट: नए प्लांट्स को नेशनल गैस ग्रिड से जोड़ने के लिए पाइपलाइन बिछाने में सरकार मदद करेगी।

    • क्रेडिट गारंटी: एमएसएमई को प्लांट लगाने के लिए लोन आसानी से मिले, इसलिए एक क्रेडिट गारंटी स्कीम भी दी गई है।

    इन कदमों से सरकार चाहती है कि अगले कुछ सालों में देश का सीबीजी उत्पादन करीब 10 गुना बढ़ जाए।

    सीएनजी कार मालिकों के लिए इसका क्या मतलब है?

    यह सबसे ज़रूरी सवाल है। राहत की बात यह है कि मौजूदा सीएनजी कार मालिकों पर इस बदलाव का कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। अधिकारियों ने साफ कर दिया है — गाड़ी में कोई तकनीकी छेड़छाड़ करने की ज़रूरत नहीं।

    बायो-सीएनजी की रासायनिक संरचना नेचुरल गैस जैसी ही होती है, इसलिए मौजूदा सीएनजी वाहन इसे बिना किसी बदलाव के — इंजन में भी नहीं, फ्यूल टैंक में भी नहीं — सीधे इस्तेमाल कर सकते हैं। वही पंप, वही परफॉर्मेंस, वही माइलेज। सारा फर्क अपस्ट्रीम यानी गैस डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के स्तर पर पड़ेगा, जो ड्राइवर को बिल्कुल नजर नहीं आएगा। ई2ओ पेट्रोल को लेकर जो अनिश्चितताएं और चिंताएं रही हैं, यह मामला उससे काफी अलग है। नई सीएनजी कार खरीदने की सोच रहे ग्राहकों के लिए यह अच्छी खबर है — बिना कोई अतिरिक्त खर्च किए, वक्त के साथ उनका फ्यूल खुद-ब-खुद और पर्यावरण-अनुकूल होता जाएगा।

    कारदेखो ओपिनियन

    Bio-CNG and Ethanol Blending

    जैसे एथेनॉल ब्लेंडिंग ने पेट्रोल मार्केट की तस्वीर बदल दी, वैसे ही बायो-सीएनजी की अनिवार्य मिक्सिंग गैसीय फ्यूल का भविष्य तय करेगी। आम ग्राहक के लिए असली राहत यही है कि यह पूरा बदलाव बिना किसी झंझट के चुपचाप बैकग्राउंड में होता रहेगा।

    बायो-सीएनजी नेचुरल गैस का करीब-करीब वैसा ही विकल्प है, इसलिए ई2ओ जैसी कम्पैटिबिलिटी की बहस यहाँ खड़ी नहीं होगी। उल्टा, यह कदम सीएनजी को एक भरोसेमंद और टिकाऊ फ्यूल के तौर पर और पक्का करता है। असली काम अब इंडस्ट्री और नीति-निर्माताओं का है। आने वाले कुछ वर्षों में 3-5% ब्लेंडिंग टारगेट पूरे करने हैं, तो बायो-सीएनजी का प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तेज़ रफ़्तार से खड़ा करना होगा। यह प्लान अगर सही ढंग से चला, तो भारत की एनर्जी सिक्योरिटी और पर्यावरण, दोनों मोर्चों पर बड़ी जीत मिलेगी।

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    तीर्थ
    Tirth Pandya is a Senior Correspondent with the CarDekho Group and an automotive media professional with over 6 years of experience covering cars, EVs, and the ever-evolving world of mobility. An Automobile Engineering graduate, he specialises in automotive news, feature writing, launch coverage, and experiential storytelling. His love for machines began long before his professional career, fuelled by an enduring fascination with cars and even aeroplanes. Since entering the industry in 2020, he has spent countless hours on the road, chasing stories that take him from bustling city streets to remote off-road trails, always searching for the next great automotive experience. He combines technical expertise with a genuine passion for driving and exploration to bring readers engaging, insightful, and human-centric stories that capture not just the machines but also the emotions, adventures, and people behind them.और देखें

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