किआ सेल्टोस पेट्रोल Vs डीजल कंपेरिजन: वास्तव में ज्यादा माइलेज किसका है और रनिंग कॉस्ट किसकी कम है, जानिए यहां
हालांकि डीजल इंजन अभी भी बेहतर हैं, लेकिन अब इन्होंने पेट्रोल इंजन के मुकाबले फ्यूल एफिशिएंसी का अपना फायदा काफी हद तक खो दिया है।
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जब भी कार के माइलेज की बात आती है, तो डीजल इंजन को हमेशा पेट्रोल पर तरजीह दी जाती रही है। लेकिन, सख्त एमिशन नॉर्म्स नियमों के लागू होने के बाद डीजल इंजनों पर काफी दबाव आया है। बीएस6 फेज 2 जैसे नए नियमों का पालन करने के लिए, कंपनियों को डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर और यूरिया-आधारित सिस्टम जैसे एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इन बदलावों की वजह से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आज के मॉडर्न डीजल इंजन वाकई पुराने डीजल इंजनों जितने ही एफिशिएंट हैं? क्या कम रनिंग कॉस्ट और बेहतर माइलेज के लिए आज भी डीजल कार पहली पसंद होनी चाहिए?
इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमने किआ सेल्टोस के तीन अलग-अलग पावरट्रेन विकल्पों का एक रियल-वर्ल्ड टेस्ट किया है। इस टेस्ट में 1.5-लीटर टर्बो-पेट्रोल डीसीटी (ऑटोमैटिक), 1.5-लीटर डीजल एटी (ऑटोमैटिक), और 1.5-लीटर डीजल एमटी (मैनुअल) शामिल थे। इस टेस्ट के परिणाम आगे बताए गए हैं:
टेस्ट रूट और शर्तें
इस टेस्ट का मकसद था कि गाड़ियों के माइलेज को वास्तविक ड्राइविंग परिस्थितियों में परखा जाए, न कि किसी आदर्श लैब कंडीशन में। इसलिए, एक ऐसा रूट चुना गया जिसमें हर तरह की सड़कें शामिल हों, जैसी एक आम भारतीय ड्राइवर को रोजमर्रा की जिंदगी में मिलती है। कुल 150 किलोमीटर के इस रूट को तीन बराबर हिस्सों में बांटा गया था:
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50 किलोमीटर एक्सप्रेसवे: यहां गाड़ियों को 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत रफ्तार पर चलाया गया।
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50 किलोमीटर हाईवे: इसमें औसत रफ्तार थोड़ी कम थी और रास्ते में कुछ चढ़ाई और ढलान भी शामिल थे।
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50 किलोमीटर शहरी ट्रैफिक: यह सफर पुणे शहर के अंदर तय किया गया, जहां ट्रैफिक की स्थितियां बदलती रहती हैं।

टेस्ट के दौरान तीनों कारों को एक साथ चलाया गया ताकि उन पर बाहरी परिस्थितियों का असर एक जैसा रहे। ड्राइविंग का तरीका भी बिल्कुल सामान्य रखा गया था। स्पीड लिमिट का पालन किया गया और बेवजह तेज एक्सीलरेशन या हार्ड ब्रेकिंग से बचा गया। कोशिश यही थी कि एक आम आदमी अपनी फैमिली कार को जैसे चलाता है, वैसे ही चलाया जाए। पूरे रास्ते एयर कंडीशनिंग (एसी) को 23 डिग्री सेल्सियस पर सेट रखा गया और एयर वेंटिलेशन ऑन था।
यहां एक बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है: डीजल मैनुअल वेरिएंट उस दिन एक सपोर्ट कार के तौर पर इस्तेमाल हो रही था। इसका काम वीडियो शूट के लिए बाकी दो ऑटोमैटिक कारों को ट्रैक करना था। कैमरामैन की जरूरतों के हिसाब से इसके ड्राइवर को बार-बार थ्रॉटल एडजस्ट करना पड़ रहा था, जिससे इसकी ड्राइविंग स्टाइल थोड़ी आक्रामक हो गई। इस वजह से, डीजल मैनुअल की फ्यूल एफिशिएंसी के आंकड़े सीधे तौर पर बाकी दो कारों से तुलनीय नहीं हैं, और इस पर हम आगे विस्तार से बात करेंगे।
आंकड़ों की जांच
टेस्ट के हर 50 किलोमीटर के पड़ाव पर, तीनों कारों के मल्टी-इन्फॉर्मेशन डिस्प्ले (एमआईडी) पर दिख रही इंडिकेटेड फ्यूल एफिशिएंसी को नोट किया गया। इससे यह समझने में मदद मिली कि अलग-अलग तरह की सड़कों पर हर पावरट्रेन कैसा परफॉर्म कर रहा है।
पहला 50 किलोमीटर (एक्सप्रेसवे)

एक्सप्रेसवे पर ड्राइव उम्मीद के मुताबिक बेहद आसान थी। ट्रैफिक लगभग न के बराबर था, जिससे एक स्थिर गति बनाए रखना संभव हुआ। दोनों ऑटोमैटिक कारों, टर्बो-पेट्रोल डीसीटी और डीजल एटी को क्रूज कंट्रोल पर सेट कर दिया गया था। इस टेस्ट में मिले नतीजे इस प्रकार थे:
| माइलेज के आंकड़े (50 किलोमीटर एक्सप्रेसवे ड्राइविंग के बाद) |
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| टर्बो-पेट्रोल डीसीटी |
15.4 किलोमीटर प्रति लीटर |
| डीजल एटी |
16.2 किलोमीटर प्रति लीटर |
यहां डीजल ऑटोमैटिक ने पेट्रोल पर मामूली बढ़त बनाई, जैसा कि उम्मीद थी।
50 किलोमीटर हाईवे ड्राइव

अगले 50 किलोमीटर पुराने हाईवे पर कार ड्राइव की गई। यहां औसत रफ्तार 50 से 80 किलोमीटर प्रति घंटे के बीच रही। यह हाईवे भी उम्मीद से ज्यादा खाली मिला, जिससे गाड़ियों को ज्यादा रुकना नहीं पड़ा। 100 किलोमीटर पूरे होने पर कुल इंडिकेटेड एफिशिएंसी के आंकड़े कुछ इस तरह थे:
| माइलेज के आंकड़े (50 किलोमीटर एक्सप्रेसवे और 50 किलोमीटर हाईवे ड्राइविंग के बाद) |
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| टर्बो-पेट्रोल डीसीटी |
15.9 किलोमीटर प्रति लीटर |
| डीजल एटी |
16.6 किलोमीटर प्रति लीटर |
हाईवे पर भी डीजल ऑटोमैटिक ने अपनी बढ़त बनाए रखी और दोनों पावरट्रेन की एफिशिएंसी में सुधार देखा गया।
आखिरी 50 किलोमीटर (शहर)

टेस्ट का अंतिम चरण पुणे के शहरी ट्रैफिक में था, जहां औसत रफ्तार 0 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे के बीच रही। हालांकि, उस दिन ट्रैफिक उम्मीद से कम था।शहर में कार का माइलेज इस प्रकार रहा:
| माइलेज के आंकड़े (शहर में 50 किलोमीटर ड्राइविंग के बाद) |
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| टर्बो-पेट्रोल डीसीटी |
10.3 किलोमीटर प्रति लीटर |
| डीजल एटी |
10.1 किलोमीटर प्रति लीटर |
शहर के ट्रैफिक में टर्बो-पेट्रोल डीसीटी ने डीजल ऑटोमैटिक को मामूली अंतर से पीछे छोड़ दिया। यह दिखाता है कि स्टॉप-एंड-गो ट्रैफिक में मॉडर्न टर्बो-पेट्रोल इंजन कितने एफिशिएंट हो सकते हैं।
कुल 150 किलोमीटर के बाद इंडिकेटेड एफिशिएंसी
पूरे 150 किलोमीटर के मिले-जुले सफर के बाद, तीनों कारों के डिस्प्ले पर जो फाइनल आंकड़े दिखे, वे इस प्रकार थे:
| माइलेज के आंकड़े (50 किलोमीटर एक्सप्रेसवे, 50 किलोमीटर हाईवे ड्राइविंग, और 50 किलोमीटर शहर में ड्राइविंग के बाद) |
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| टर्बो-पेट्रोल डीसीटी |
13.2 किलोमीटर प्रति लीटर |
| डीजल एटी |
13.4 किलोमीटर प्रति लीटर |
| डीजल एमटी |
14.3 किलोमीटर प्रति लीटर |
स्क्रीन पर दिखे आंकड़ों के हिसाब से, डीजल मैनुअल सबसे ज्यादा एफिशिएंट रही, इसके बाद डीजल ऑटोमैटिक और फिर टर्बो-पेट्रोल डीसीटी का नंबर आया। लेकिन असली कहानी टैंक-टू-टैंक मेथड से पता चलती है।
फाइनल कैलकुलेशन: असली नतीजा क्या है?

कार के डिस्प्ले पर दिखने वाले आंकड़े हमेशा 100% सटीक नहीं होते। इसलिए, असली फ्यूल एफिशिएंसी और रनिंग कॉस्ट निकालने के लिए टैंक-टू-टैंक मेथड का इस्तेमाल किया गया। इसमें टेस्ट के बाद गाड़ी में दोबारा फ्यूल भरा जाता है और यह देखा जाता है कि कुल कितने लीटर फ्यूल की खपत हुई। इस मेथड से मिले नतीजे ही सबसे भरोसेमंद माने जाते हैं।
| परिणाम |
पेट्रोल एटी |
डीजल एटी |
डीजल एमटी |
| तय दूरी |
150.3 किलोमीटर |
150.9 किलोमीटर |
157 किलोमीटर |
| फ्यूल कीमत |
1271.87 रुपये |
969.52 रुपये |
1174.62 रुपये |
| फ्यूल खपत |
11.41 लीटर |
9.88 लीटर |
11.97 लीटर |
| असल टेस्टेड माइलेज* |
13.17 किलोमीटर प्रति लीटर |
15.27 किलोमीटर प्रति लीटर |
13.11 किलोमीटर प्रति लीटर |
| रनिंग कॉस्ट |
8.46 रुपये प्रति किलोमीटर |
6.42 रुपये प्रति किलोमीटर |
7.48 रुपये प्रति किलोमीटर |
*रियल-वर्ल्ड टेस्टेड एफिशिएंसी = तय की गई दूरी ÷ खर्च हुआ फ्यूल

इन फाइनल आंकड़ों से कई दिलचस्प बातें सामने आईं:
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डीजल ऑटोमैटिक असली विजेता: 15.27 किलोमीटर प्रति लीटर की रियल-वर्ल्ड एफिशिएंसी और 6.42 रुपये प्रति किलोमीटर की सबसे कम रनिंग कॉस्ट के साथ, डीजल ऑटोमैटिक इस टेस्ट का विजेता है। दिलचस्प बात यह है कि इसका स्क्रीन माइलेज (13.4 किलोमीटर प्रति लीटर) इसके असली माइलेज से लगभग 2 किलोमीटर प्रति लीटर कम था।
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पेट्रोल ऑटोमैटिक का प्रदर्शन: टर्बो-पेट्रोल डीसीटी का असली माइलेज (13.17 किलोमीटर प्रति लीटर) उसके इंडिकेटेड आंकड़े (13.2 किलोमीटर प्रति लीटर) के बहुत करीब था। जैसा कि उम्मीद थी, इसकी रनिंग कॉस्ट 8.46 रुपये प्रति किलोमीटर के साथ तीनों में सबसे ज्यादा रही।
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डीजल मैनुअल: डीजल मैनुअल की रियल-वर्ल्ड एफिशिएंसी (13.11 किलोमीटर प्रति लीटर) सबसे कम रही। लेकिन जैसा पहले बताया गया, वीडियो शूट के लिए इसे आक्रामक तरीके से चलाया गया था।
कारदेखो का क्या है कहना
इस टेस्ट से यह तो साफ हो गया कि रनिंग कॉस्ट के मामले में डीजल कार अब भी पेट्रोल कार से बेहतर है। हालांकि, यह भी सच है कि दोनों के बीच माइलेज का अंतर अब उतना बड़ा नहीं रहा जितना कुछ साल पहले हुआ करता था। एक और महत्वपूर्ण पहलू है कीमत का अंतर। किआ सेल्टोस के डीजल वेरिएंट्स अपने स्टैंडर्ड पेट्रोल वेरिएंट्स से लगभग 30,000 रुपये से 80,000 रुपये महंगे हैं। यह अंतर पहले देखे गए 1 लाख रुपये से 1.5 लाख रुपये के अंतर से काफी कम है। इस मामूली कीमत अंतर का आपकी ईएमआई पर भी बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।

तो सवाल यह है कि आपको कौनसा इंजन चुनना चाहिए? इसका जवाब आपकी जरूरत पर निर्भर करता है।
डीजल इंजन किसे खरीदना चाहिए?
अगर आपकी रोज की रनिंग बहुत ज्यादा है, आप अक्सर एक शहर से दूसरे शहर सफर करते हैं, और आपका ज्यादातर समय एक्सप्रेसवे या हाईवे पर गुजरता है, तो डीजल आपके लिए सही विकल्प है। यह आपको बेहतर माइलेज, लंबी टैंक रेंज और लंबे समय में कम रनिंग कॉस्ट देगा।
पेट्रोल इंजन किसके लिए बेहतर है?
अगर आपकी कार ज्यादातर शहर में ही चलती है, जहां आपको ट्रैफिक में ज्यादा समय बिताना पड़ता है, और आप कभी-कभार ही लंबी रोड ट्रिप पर जाते हैं, तो पेट्रोल इंजन एक बेहतर विकल्प हो सकता है। यह आपको एक ज्यादा रिफाइंड और शांत ड्राइविंग अनुभव देगा। साथ ही, आप शुरुआत में कुछ पैसे भी बचाएंगे और डीपीएफ (डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर) के जाम होने की चिंता से भी मुक्त रहेंगे, जो कि डीजल कारों को शहर में छोटी दूरी के लिए चलाने पर एक आम समस्या हो सकती है।
अंत में, भले ही मॉडर्न डीजल इंजनों ने पेट्रोल पर अपनी एफिशिएंसी की बड़ी बढ़त कुछ हद तक गंवा दी हो, लेकिन लंबी दूरी के सफर के लिए वे आज भी एक बेहतर और किफायती विकल्प बने हुए हैं।














